Wednesday, November 02, 2011

Untitled

बंध गयी दीवारें 
बिना झरोकों के तो क्या?
दरारों से बेहेती रोशनी
क्या कुछ कम चमकती है?
पेहेली बारिशों की 
सौंधी सी खुशबू,
दीवारों के इस पार भी
तो उतनी ही मेहेकती है.  

दुनिया की खामियाँ 
अगर ढूंडोगे तुम,
तो उँगलियों पर
गिन न सकोगे.
हर एक खोट पर 
अगर होगे नाराज़,
तो खामखा तुम ही थकोगे.

आखिर कमियों के
खालीपन को भरने से
हम क्यूँ हिचकिचाते हैं?
कभी-कभी, 
खुरदुरे पन्नों पर लिखे
टेढ़े-मेढ़े से शब्द भी तो
गीतों के बोल बन जाते हैं. 

7 comments:

Anand said...

दरारों से बेहेती रोशनी
क्या कुछ कम चमकती है?

Brilliant!

Nivedita Agashe said...

thanks :)

Anand said...

Hey, that's nice of you to consider my opinion. Kinda unexpected :-)
Btw will you try writing lyrics for a song? Me and my band mates have a concept. If you are interested drop in a mail, anandaltekar@gmail.com will explain the concept in detail there.

Nivedita Agashe said...

anand: well... if the opinion makes sense then why not...

Aish said...

दुनिया झरोको का मेला है
मुट्ठी की सोच
या दूरबीन का नजारा
हर परदे के पीछे
मिलती अनोखी दास्तान है

भीग्ना हो जो इसकी रोशनी में
तो परदों को गिरादो
मेले की इस चकचौंद को
स्याही में ढाल दो

Sangitaa said...

bilkul sach kaha tumne...jisne ose ki boondon se apni pyaas bujhana seekh liya,use saagar se kya kaam:-))

Nivedita Agashe said...

anand: btw now in retrospect i think u were right abt those lines in the earlier hindi poem... i'm rethinking those.. may be i can do away with them altogether