Wednesday, July 25, 2012

Habit

Among the spidery trees of the
forest of wants and needs
I roam in the shadows of habit.
And sometimes maybe you wonder
if you ever wanted me at all.
Or was it just the lonlinesses of
a dark forest's smothering silence
that needed my presence.
Just so that my feet could
make a crisp, crackling music
as they trampled over a few old twigs
and a few brittle hearts.

Wednesday, July 04, 2012

माचिस


बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी रखी हुई
माचिसों की तीलियां

ख्वाबों  की  हैं  बंदिशें
ख्वाहिशों  कि  बेड़ियाँ 
बुझी-बुझी  खामोश  सी
माचिसों की तीलियाँ

कभी  जला  के  तो देख
दबी -दबी  ये  लौ  तेरी
उड़ने  दे  चिंगारियां
आज़ाद, पागल, सरफिरी

 मिलने दे तू राख में
हर  चाह जो  तेरी  नहीं
धुन्द्लाने दे  ये आसमां
तपने दे  तू ये ज़मीन

 नाचने दे इस आग को
उठने दे तू अब  धुआं
याद  कर तेरा अहम्
और आज ये जहां भुला

 बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी थी कभी रखी
माचिसों की तीलियां