Wednesday, July 04, 2012

माचिस


बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी रखी हुई
माचिसों की तीलियां

ख्वाबों  की  हैं  बंदिशें
ख्वाहिशों  कि  बेड़ियाँ 
बुझी-बुझी  खामोश  सी
माचिसों की तीलियाँ

कभी  जला  के  तो देख
दबी -दबी  ये  लौ  तेरी
उड़ने  दे  चिंगारियां
आज़ाद, पागल, सरफिरी

 मिलने दे तू राख में
हर  चाह जो  तेरी  नहीं
धुन्द्लाने दे  ये आसमां
तपने दे  तू ये ज़मीन

 नाचने दे इस आग को
उठने दे तू अब  धुआं
याद  कर तेरा अहम्
और आज ये जहां भुला

 बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी थी कभी रखी
माचिसों की तीलियां 

4 comments:

Ashish Ashok Kalpund said...

loved it!!!

Marvin said...

Maybe it is the fact that I don't see a lot of people my age writing in Hindi and English these days. Maybe your poems genuinely do deserve praise. Either way, I have you to thank for some beautiful ideas.

Nivedita Agashe said...

@Marvin: though I think its more the first reason I sure hope they do deserve some genuine praise too :) thanks for all the good words..keep visiting

Prabhu Dutta Das said...

Brilliant. I have to say this.