Wednesday, December 19, 2012

भूल

ईटों के पत्थरों के 
बना लिए तूने मकां
भूल गया खिड़कियाँ 
और झरोकों के निशां 

अब रौशनी
झाकेगी कहाँ से 
कैसे रातें हटेंगी 
अंधराए जहां से 

दीवारे उठेंगी 
जब हर दिशा में 
खो जायेगा तब तू 
इस काली निशा में 

सोने की जगमग 
काफ़ी न होगी 
पैसों की खनखन 
काफी न होगी 
इन अंधेरों में 
जो तू ढूँढेगा राहें  
तेरी ये दौलत 
काफी न होगी 

ईटों, पत्थरों के क्या
संगेमरमर के भी
बना लिए तूने मकां
पर भूल गया उजाले 
नासमझ ये इन्सां  

Friday, December 07, 2012

Calendar

A bookshelf
full of books.
And friends
of every kind.
For she panics
when the room
is empty and
full is her mind.