Tuesday, March 05, 2013

मकां

इन मकानों में लोग
कुछ ऐसे रेहेते हैं,
कि इंसानों से ज़्यादा जां 
वो ईटों, पत्थरों में भरते हैं।
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं।

इन मकानों की खिड़कियाँ 
हमेशा बंद ही हैं रेहेती।
बाहर मौसम तो
कई गुज़रते हैं,
पर इन खिडकियों पर
परदे यादों के, 
बस बे इन्तहां बेहेते हैं। 
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं। 

दिवारों पर शायद उन्हें 
कल के हसीं लम्हें 
आज भी दिखते हैं।
इसलिये शायद, 
खाली कमरों में गूंज रहे 
अपने ही अलफ़ाज़ों को 
बातें वो अब केहेते हैं।  
भूले से उन दिनों के 
इन मकानों में 
लोग कुछ ऐसे रेहेते हैं।

3 comments:

Anjali said...

heheh i thought the title is manka

Nivedita Agashe said...

hahahahahaha

anji your hindi sucks

Anjali said...

yeah my english also i think. btw, i read the first verse out loud, i felt like i was in 9th std..