Wednesday, April 10, 2013

बेघर

मोहोल्लों के मैदानों में
हम खेला तो करते थे।

आँगन के झूले पर हम
झूला भी करते थे।

पर खेलों में हमारे
शायद एक खामोश सा
खालीपन था।

बड़ा होने की जल्दी में
शायद हमारा वो
बचपन था।

अब उस बात को
कई साल हैं हो चुके।

यादों के भवर भी तो
अब जा कर ही हैं रुके।

शुक्र है, मुझे नहीं पता
अब हम रेहेते हैं कहाँ।

था हमारा वो अधुरा सा मकां जहाँ,
किसी और का घर अब है वहाँ।

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