Sunday, April 14, 2013

Untitled

अधूरी सी उस रात में 
कोयला यूँ जल रहा था 
मानो सूरज का एक टुकड़ा
जमीं पर पिघल रहा था 
पता नहीं क्यूँ उस रात में 
खामोशी यूँ बस गयी थी 
मानो समझ के गले पर
उम्मीदों की डोर कस गयी थी 
अब इस सन्नाटे में
कुछ कहा न जाएगा  
कल बीता था जैसे, 
वैसे आज भी बीत जाएगा 
और जैसे जैसे कोयले की
रौशनी होगी मद्धम 
वैसे वैसे ये कारवां उठ कर 
कहीं और मुड़ जाएगा 

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