Hogwash and gibberish.
Wednesday, February 23, 2011
untitled
दीवारों पर दो नाम लिखने तक की ना थी जगह,
यूँ मिट रहे थे साए अपनी ही रंगत में.
दीवारों पर रची ये शाम थी इस तलक गेहेरी,
कि आसमा में सजे लहूलुहान बादल
भी पड़ गए थे हैरत में.
untitled
दीवारों पर दो नाम लिखने तक की ना थी जगह,
यूँ मिट रहे थे साए अपनी ही रंगत में.
दीवारों पर रची ये शाम थी इस तलक गेहेरी,
कि आसमा में सजे लहूलुहान बादल
भी पड़ गए थे हैरत में.
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