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Monday, March 03, 2014

बंजारे

थोड़े बंजारों से
थोड़े फ़कीरों से
तो हम भी हैं

परे दहलीज़ कि
लकीरों से तो
थोड़े हम भी हैं

बारिशों में
बेह गए तिनके जो
थोड़ा उनका गम भी है

पर उड़ानों को हमारी
ये आसमान पड़ता
थोड़ा कम भी है

बंजारे

थोड़े बंजारों से
थोड़े फ़कीरों से
तो हम भी हैं

परे दहलीज़ कि
लकीरों से तो
थोड़े हम भी हैं

बारिशों में
बेह गए तिनके जो
थोड़ा उनका गम भी है

पर उड़ानों को हमारी
ये आसमान पड़ता
थोड़ा कम भी है

Tuesday, January 07, 2014

कंकड़

ऐसा  नहीं है कि
महसूस नहीं होता
अकेलापन कभी.
कुछ पल ऐसे भी
आते हैं जब घूमता
है वो इर्द-गिर्द
पहाड़ों से उठती
धुंद सा.
मानो यादों से बनी
रूह कोई  छू गयी हो
अपने सर्द हाथों से.
ऐसा नहीं है कि
महसूस नहीं होता
खालीपन कभी.
पर समेट लेती हूँ मैं
उसे अंजल-अंजल
भर-भर के.
मोम सा पिघलता है
हाथों कि गर्मी से
वो फिर.
किसी किनारे से उठाये
मखमली एक पत्थर,
एक कंकड़ सा.
जेबों में रख कर
घूमती हूँ उसे.
तकलीफ़ तो नहीं होती
पर एक एहसास
रेहता है ज़रूर.
बोझ सा कोई.
झील जब आती
है कोई रास्तों में
तब फ़ेंक देती हूँ उसे
उसकी गहराईओं में.
थोड़ी दूर तक
उछलते-उछलते
जाता है वो फिर.
पर फिर समा ही
जाता है, चला ही जाता है
नज़रों से दूर.



कंकड़

ऐसा  नहीं है कि
महसूस नहीं होता
अकेलापन कभी.
कुछ पल ऐसे भी
आते हैं जब घूमता
है वो इर्द-गिर्द
पहाड़ों से उठती
धुंद सा.
मानो यादों से बनी
रूह कोई  छू गयी हो
अपने सर्द हाथों से.
ऐसा नहीं है कि
महसूस नहीं होता
खालीपन कभी.
पर समेट लेती हूँ मैं
उसे अंजल-अंजल
भर-भर के.
मोम सा पिघलता है
हाथों कि गर्मी से
वो फिर.
किसी किनारे से उठाये
मखमली एक पत्थर,
एक कंकड़ सा.
जेबों में रख कर
घूमती हूँ उसे.
तकलीफ़ तो नहीं होती
पर एक एहसास
रेहता है ज़रूर.
बोझ सा कोई.
झील जब आती
है कोई रास्तों में
तब फ़ेंक देती हूँ उसे
उसकी गहराईओं में.
थोड़ी दूर तक
उछलते-उछलते
जाता है वो फिर.
पर फिर समा ही
जाता है, चला ही जाता है
नज़रों से दूर.



Sunday, April 14, 2013

Untitled

अधूरी सी उस रात में 
कोयला यूँ जल रहा था 
मानो सूरज का एक टुकड़ा
जमीं पर पिघल रहा था 
पता नहीं क्यूँ उस रात में 
खामोशी यूँ बस गयी थी 
मानो समझ के गले पर
उम्मीदों की डोर कस गयी थी 
अब इस सन्नाटे में
कुछ कहा न जाएगा  
कल बीता था जैसे, 
वैसे आज भी बीत जाएगा 
और जैसे जैसे कोयले की
रौशनी होगी मद्धम 
वैसे वैसे ये कारवां उठ कर 
कहीं और मुड़ जाएगा 

Untitled

अधूरी सी उस रात में 
कोयला यूँ जल रहा था 
मानो सूरज का एक टुकड़ा
जमीं पर पिघल रहा था 
पता नहीं क्यूँ उस रात में 
खामोशी यूँ बस गयी थी 
मानो समझ के गले पर
उम्मीदों की डोर कस गयी थी 
अब इस सन्नाटे में
कुछ कहा न जाएगा  
कल बीता था जैसे, 
वैसे आज भी बीत जाएगा 
और जैसे जैसे कोयले की
रौशनी होगी मद्धम 
वैसे वैसे ये कारवां उठ कर 
कहीं और मुड़ जाएगा 

Wednesday, April 10, 2013

बेघर

मोहोल्लों के मैदानों में
हम खेला तो करते थे।

आँगन के झूले पर हम
झूला भी करते थे।

पर खेलों में हमारे
शायद एक खामोश सा
खालीपन था।

बड़ा होने की जल्दी में
शायद हमारा वो
बचपन था।

अब उस बात को
कई साल हैं हो चुके।

यादों के भवर भी तो
अब जा कर ही हैं रुके।

शुक्र है, मुझे नहीं पता
अब हम रेहेते हैं कहाँ।

था हमारा वो अधुरा सा मकां जहाँ,
किसी और का घर अब है वहाँ।

बेघर

मोहोल्लों के मैदानों में
हम खेला तो करते थे।

आँगन के झूले पर हम
झूला भी करते थे।

पर खेलों में हमारे
शायद एक खामोश सा
खालीपन था।

बड़ा होने की जल्दी में
शायद हमारा वो
बचपन था।

अब उस बात को
कई साल हैं हो चुके।

यादों के भवर भी तो
अब जा कर ही हैं रुके।

शुक्र है, मुझे नहीं पता
अब हम रेहेते हैं कहाँ।

था हमारा वो अधुरा सा मकां जहाँ,
किसी और का घर अब है वहाँ।

Tuesday, March 05, 2013

मकां

इन मकानों में लोग
कुछ ऐसे रेहेते हैं,
कि इंसानों से ज़्यादा जां 
वो ईटों, पत्थरों में भरते हैं।
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं।

इन मकानों की खिड़कियाँ 
हमेशा बंद ही हैं रेहेती।
बाहर मौसम तो
कई गुज़रते हैं,
पर इन खिडकियों पर
परदे यादों के, 
बस बे इन्तहां बेहेते हैं। 
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं। 

दिवारों पर शायद उन्हें 
कल के हसीं लम्हें 
आज भी दिखते हैं।
इसलिये शायद, 
खाली कमरों में गूंज रहे 
अपने ही अलफ़ाज़ों को 
बातें वो अब केहेते हैं।  
भूले से उन दिनों के 
इन मकानों में 
लोग कुछ ऐसे रेहेते हैं।

मकां

इन मकानों में लोग
कुछ ऐसे रेहेते हैं,
कि इंसानों से ज़्यादा जां 
वो ईटों, पत्थरों में भरते हैं।
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं।

इन मकानों की खिड़कियाँ 
हमेशा बंद ही हैं रेहेती।
बाहर मौसम तो
कई गुज़रते हैं,
पर इन खिडकियों पर
परदे यादों के, 
बस बे इन्तहां बेहेते हैं। 
इन मकानों में लोग 
कुछ ऐसे रेहेते हैं। 

दिवारों पर शायद उन्हें 
कल के हसीं लम्हें 
आज भी दिखते हैं।
इसलिये शायद, 
खाली कमरों में गूंज रहे 
अपने ही अलफ़ाज़ों को 
बातें वो अब केहेते हैं।  
भूले से उन दिनों के 
इन मकानों में 
लोग कुछ ऐसे रेहेते हैं।

Wednesday, December 19, 2012

भूल

ईटों के पत्थरों के 
बना लिए तूने मकां
भूल गया खिड़कियाँ 
और झरोकों के निशां 

अब रौशनी
झाकेगी कहाँ से 
कैसे रातें हटेंगी 
अंधराए जहां से 

दीवारे उठेंगी 
जब हर दिशा में 
खो जायेगा तब तू 
इस काली निशा में 

सोने की जगमग 
काफ़ी न होगी 
पैसों की खनखन 
काफी न होगी 
इन अंधेरों में 
जो तू ढूँढेगा राहें  
तेरी ये दौलत 
काफी न होगी 

ईटों, पत्थरों के क्या
संगेमरमर के भी
बना लिए तूने मकां
पर भूल गया उजाले 
नासमझ ये इन्सां  

भूल

ईटों के पत्थरों के 
बना लिए तूने मकां
भूल गया खिड़कियाँ 
और झरोकों के निशां 

अब रौशनी
झाकेगी कहाँ से 
कैसे रातें हटेंगी 
अंधराए जहां से 

दीवारे उठेंगी 
जब हर दिशा में 
खो जायेगा तब तू 
इस काली निशा में 

सोने की जगमग 
काफ़ी न होगी 
पैसों की खनखन 
काफी न होगी 
इन अंधेरों में 
जो तू ढूँढेगा राहें  
तेरी ये दौलत 
काफी न होगी 

ईटों, पत्थरों के क्या
संगेमरमर के भी
बना लिए तूने मकां
पर भूल गया उजाले 
नासमझ ये इन्सां  

Wednesday, July 04, 2012

माचिस


बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी रखी हुई
माचिसों की तीलियां

ख्वाबों  की  हैं  बंदिशें
ख्वाहिशों  कि  बेड़ियाँ 
बुझी-बुझी  खामोश  सी
माचिसों की तीलियाँ

कभी  जला  के  तो देख
दबी -दबी  ये  लौ  तेरी
उड़ने  दे  चिंगारियां
आज़ाद, पागल, सरफिरी

 मिलने दे तू राख में
हर  चाह जो  तेरी  नहीं
धुन्द्लाने दे  ये आसमां
तपने दे  तू ये ज़मीन

 नाचने दे इस आग को
उठने दे तू अब  धुआं
याद  कर तेरा अहम्
और आज ये जहां भुला

 बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी थी कभी रखी
माचिसों की तीलियां 

माचिस


बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी रखी हुई
माचिसों की तीलियां

ख्वाबों  की  हैं  बंदिशें
ख्वाहिशों  कि  बेड़ियाँ 
बुझी-बुझी  खामोश  सी
माचिसों की तीलियाँ

कभी  जला  के  तो देख
दबी -दबी  ये  लौ  तेरी
उड़ने  दे  चिंगारियां
आज़ाद, पागल, सरफिरी

 मिलने दे तू राख में
हर  चाह जो  तेरी  नहीं
धुन्द्लाने दे  ये आसमां
तपने दे  तू ये ज़मीन

 नाचने दे इस आग को
उठने दे तू अब  धुआं
याद  कर तेरा अहम्
और आज ये जहां भुला

 बंद-बंद डिब्बों में
बहोत हमने जी लिया
सटी-सटी थी कभी रखी
माचिसों की तीलियां 

Friday, May 11, 2012

वर्षा

गरजता है जब बादल
और बारिशों का कलश
जब यूँ उलटता है,
तब बोल आसमां
धरती पर
किन कहानियों का
वृक्ष पनपता है?

क्या मिट्टी की
खुशबुओं से
यादों का कोई
भवर सा उठता है?
या बेहेते पानी में
अतीत हर किसी का
आज मिटता है?
बोल आसमां
तेरी बूंदों में
आखिर आज
क्या बरसता है?

इन अश्रुओं में तेरे
क्या बसता है आज
धरती का सुकूं?
या फिर शिरा में तेरी
बेहेता है क्रोध का
सुर्ख लहू?
है तू आंधी
या फिर वो जीवन
जिसके लिए इन्सान
अब तरसता है.
बोल आसमां
तेरी बूंदों में 
आखिर आज
क्या बरसता है?

वर्षा

गरजता है जब बादल
और बारिशों का कलश
जब यूँ उलटता है,
तब बोल आसमां
धरती पर
किन कहानियों का
वृक्ष पनपता है?

क्या मिट्टी की
खुशबुओं से
यादों का कोई
भवर सा उठता है?
या बेहेते पानी में
अतीत हर किसी का
आज मिटता है?
बोल आसमां
तेरी बूंदों में
आखिर आज
क्या बरसता है?

इन अश्रुओं में तेरे
क्या बसता है आज
धरती का सुकूं?
या फिर शिरा में तेरी
बेहेता है क्रोध का
सुर्ख लहू?
है तू आंधी
या फिर वो जीवन
जिसके लिए इन्सान
अब तरसता है.
बोल आसमां
तेरी बूंदों में 
आखिर आज
क्या बरसता है?

Saturday, February 11, 2012

अचिंत्य

कभी-कभी 
चाहे ढूंडो कितना ही 
मेरी कविताओं में तुम्हें 
कोई अर्थ न मिलेगा.

जब तक ना देखोगे तुम
जो देखा है मैनेँ,
तब तक तुम्हें हर शब्द
व्यर्थ ही लगेगा.

चुपचाप सी रहेगी
सोच मेरी
ना ही मेरा ख्याल
तुमसे कुछ कहेगा 

स्वप्न सी  लगेगी तुम्हें
मेरी रची ये दुनिया.
और हर सत्य कल्पना 
सा बस बहेगा.

ढूंडो चाहे कितना ही 
कभी-कभी
मेरी कविताओं में
तुम्हें कोई अर्थ न मिलेगा.

अचिंत्य

कभी-कभी 
चाहे ढूंडो कितना ही 
मेरी कविताओं में तुम्हें 
कोई अर्थ न मिलेगा.

जब तक ना देखोगे तुम
जो देखा है मैनेँ,
तब तक तुम्हें हर शब्द
व्यर्थ ही लगेगा.

चुपचाप सी रहेगी
सोच मेरी
ना ही मेरा ख्याल
तुमसे कुछ कहेगा 

स्वप्न सी  लगेगी तुम्हें
मेरी रची ये दुनिया.
और हर सत्य कल्पना 
सा बस बहेगा.

ढूंडो चाहे कितना ही 
कभी-कभी
मेरी कविताओं में
तुम्हें कोई अर्थ न मिलेगा.

Wednesday, November 02, 2011

Untitled

बंध गयी दीवारें 
बिना झरोकों के तो क्या?
दरारों से बेहेती रोशनी
क्या कुछ कम चमकती है?
पेहेली बारिशों की 
सौंधी सी खुशबू,
दीवारों के इस पार भी
तो उतनी ही मेहेकती है.  

दुनिया की खामियाँ 
अगर ढूंडोगे तुम,
तो उँगलियों पर
गिन न सकोगे.
हर एक खोट पर 
अगर होगे नाराज़,
तो खामखा तुम ही थकोगे.

आखिर कमियों के
खालीपन को भरने से
हम क्यूँ हिचकिचाते हैं?
कभी-कभी, 
खुरदुरे पन्नों पर लिखे
टेढ़े-मेढ़े से शब्द भी तो
गीतों के बोल बन जाते हैं. 

Untitled

बंध गयी दीवारें 
बिना झरोकों के तो क्या?
दरारों से बेहेती रोशनी
क्या कुछ कम चमकती है?
पेहेली बारिशों की 
सौंधी सी खुशबू,
दीवारों के इस पार भी
तो उतनी ही मेहेकती है.  

दुनिया की खामियाँ 
अगर ढूंडोगे तुम,
तो उँगलियों पर
गिन न सकोगे.
हर एक खोट पर 
अगर होगे नाराज़,
तो खामखा तुम ही थकोगे.

आखिर कमियों के
खालीपन को भरने से
हम क्यूँ हिचकिचाते हैं?
कभी-कभी, 
खुरदुरे पन्नों पर लिखे
टेढ़े-मेढ़े से शब्द भी तो
गीतों के बोल बन जाते हैं.