मोहोल्लों के मैदानों में
हम खेला तो करते थे।
आँगन के झूले पर हम
झूला भी करते थे।
पर खेलों में हमारे
शायद एक खामोश सा
खालीपन था।
बड़ा होने की जल्दी में
शायद हमारा वो
बचपन था।
अब उस बात को
कई साल हैं हो चुके।
यादों के भवर भी तो
अब जा कर ही हैं रुके।
शुक्र है, मुझे नहीं पता
अब हम रेहेते हैं कहाँ।
था हमारा वो अधुरा सा मकां जहाँ,
किसी और का घर अब है वहाँ।
हम खेला तो करते थे।
आँगन के झूले पर हम
झूला भी करते थे।
पर खेलों में हमारे
शायद एक खामोश सा
खालीपन था।
बड़ा होने की जल्दी में
शायद हमारा वो
बचपन था।
अब उस बात को
कई साल हैं हो चुके।
यादों के भवर भी तो
अब जा कर ही हैं रुके।
शुक्र है, मुझे नहीं पता
अब हम रेहेते हैं कहाँ।
था हमारा वो अधुरा सा मकां जहाँ,
किसी और का घर अब है वहाँ।
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