अधूरी सी उस रात में
कोयला यूँ जल रहा था
मानो सूरज का एक टुकड़ा
जमीं पर पिघल रहा था
पता नहीं क्यूँ उस रात में
खामोशी यूँ बस गयी थी
मानो समझ के गले पर
उम्मीदों की डोर कस गयी थी
अब इस सन्नाटे में
कुछ कहा न जाएगा
कल बीता था जैसे,
वैसे आज भी बीत जाएगा
और जैसे जैसे कोयले की
रौशनी होगी मद्धम
वैसे वैसे ये कारवां उठ कर
कहीं और मुड़ जाएगा
कोयला यूँ जल रहा था
मानो सूरज का एक टुकड़ा
जमीं पर पिघल रहा था
पता नहीं क्यूँ उस रात में
खामोशी यूँ बस गयी थी
मानो समझ के गले पर
उम्मीदों की डोर कस गयी थी
अब इस सन्नाटे में
कुछ कहा न जाएगा
कल बीता था जैसे,
वैसे आज भी बीत जाएगा
और जैसे जैसे कोयले की
रौशनी होगी मद्धम
वैसे वैसे ये कारवां उठ कर
कहीं और मुड़ जाएगा
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