गरजता है जब बादल
और बारिशों का कलश
जब यूँ उलटता है,
तब बोल आसमां
धरती पर
किन कहानियों का
वृक्ष पनपता है?
क्या मिट्टी की
खुशबुओं से
यादों का कोई
भवर सा उठता है?
या बेहेते पानी में
अतीत हर किसी का
आज मिटता है?
बोल आसमां
तेरी बूंदों में
आखिर आज
क्या बरसता है?
और बारिशों का कलश
जब यूँ उलटता है,
तब बोल आसमां
धरती पर
किन कहानियों का
वृक्ष पनपता है?
क्या मिट्टी की
खुशबुओं से
यादों का कोई
भवर सा उठता है?
या बेहेते पानी में
अतीत हर किसी का
आज मिटता है?
बोल आसमां
तेरी बूंदों में
आखिर आज
क्या बरसता है?
इन अश्रुओं में तेरे
क्या बसता है आज
धरती का सुकूं?
धरती का सुकूं?
या फिर शिरा में तेरी
बेहेता है क्रोध का
सुर्ख लहू?
है तू आंधी
अब तरसता है.
बेहेता है क्रोध का
सुर्ख लहू?
है तू आंधी
या फिर वो जीवन
जिसके लिए इन्सान अब तरसता है.
बोल आसमां
तेरी बूंदों में
तेरी बूंदों में
आखिर आज
क्या बरसता है?
क्या बरसता है?
5 comments:
bhaari ahe, mala aavdli.
@anand: Thanks :)
hey,
quite like the way you write, with your permission i'd like to take a print out of "Varsha" and stick it out in my balcony and see if it works....
Hey
I feel like the rain and cloud is just a name used for something else. Loved this poem because it says a lot beyond those words. The story of our sufferings.
@Atul Sir: Yeah.. The sky is a metaphor for God, the higher power, destiny or whatever else people might choose to call it... while the rain is what that entity showers humanity with.. it could be happiness or pain.. relief or struggle...we cannot predict or control it.. we can only anticipate
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