Wednesday, February 23, 2011

untitled


दीवारों पर दो नाम लिखने तक की  ना थी जगह,
यूँ मिट रहे थे साए अपनी ही रंगत में.
दीवारों पर रची ये शाम थी इस तलक गेहेरी,
कि आसमा में सजे लहूलुहान बादल
भी पड़ गए थे हैरत में.

10 comments:

Chandni said...

I like this direction you're taking :) want to see more of the Hindi ones now!

Nivedita Agashe said...

@chandni: doesn't come naturally to me but i'll try. :)

Anonymous said...

शाम का इस तरह मचल जाना जायज़ था
आपकी परछाई ने जो छेड़ा था उसे
और बादल...
वोह भी क्या करता बेचारा
आखिर हिंदी में नगमा पेश किया था आपने!

Nivedita Agashe said...

@anonymous: thanks for your comment. i don't really have an apt reply in hindi. :)

Mariposa... said...

WOW! Can't say more...

Aish said...

साए को पीछे छोड़
कहता तुझसे आसमान.
पतंग है तू मेरे आँगन की
बिन मांझे के भर तू उड़ान.

Nivedita Agashe said...

@aish: that's nice... you wrote it?

Aish said...

Yes :)

Nivedita Agashe said...

@aish: wow.. that's pretty cool.. how come we never get to read your stuff? or hear u sing i might add? ;)

soumitra said...

फ़िजा ओम़े रंग भरने दो इन्हें
चंद लम्होंके फ़साने है...
उम्मीद की राह पर न जाने
कितने और शहीद होने बाकि है